क्या खुद को हीं खा रहा मानव शरीर? 2025 नोबेल विजेताओं ने खोजा शरीर में ‘आत्मघाती हमला’ रोकने वाला ‘ब्रेक सिस्टम’

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स्टॉकहोम: सोमवार, 6 अक्टूबर 2025 को चिकित्सा जगत की सबसे बड़ी खबर आई। अमेरिका और जापान के तीन महान वैज्ञानिकों—मैरी ई. ब्रुनको, फ्रेड रामस्डेल और शिमोन साकागुची—को इस साल का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार मिला है। इनकी खोज का विषय है ‘परिधीय प्रतिरक्षा सहिष्णुता’ (Peripheral Immune Tolerance), जिसने हमारे शरीर के सबसे बड़े रहस्य को सुलझा दिया है। सीधी भाषा में कहें तो, इन वैज्ञानिकों ने हमारे शरीर की सुरक्षा प्रणाली (Immune System) को ‘आत्मघाती हमलावर’ बनने से रोकने वाला मास्टर-स्विच खोज लिया है। यह खोज लाखों लोगों के लिए एक नई उम्मीद है, जो ऑटोइम्यून बीमारियों, कैंसर और अंग प्रत्यारोपण (Organ Transplant) जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं।

नोबेल खोज क्या है?

हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) हमारे शरीर की सेना है। इसका काम है बाहर से आए वायरस, बैक्टीरिया, और अन्य बाहरी तत्वों पर हमला करके हमें बचाना। लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल था: जब सेना को हमला करने के लिए बनाया गया है, तो वह गलती से शरीर के अपने ही अंगों (जैसे त्वचा, जोड़, किडनी) पर हमला क्यों नहीं कर देती?

जवाब हमारी कोशिकाओं में वैज्ञानिकों ने ‘नियामक टी-कोशिकाओं’ यानी Treg(ट्रेग) कोशिकाओं को खोज लिया है

उदाहरण से समझिए Treg कोशिकाएँ:

Treg कोशिकाओं को आप ऐसे समझिए, जैसे किसी बड़ी फैक्ट्री में सुरक्षा अलार्म को बंद करने वाला बटन या सेना का ‘सीज़फायर’ (युद्धविराम) बटन

  • सामान्य सिपाही: हमारे शरीर की सामान्य T-कोशिकाएँ वह सेना हैं, जो हमला करती हैं।
  • Treg कोशिकाएँ: ये नियंत्रक अधिकारी हैं। जब सिपाही हमला करने के लिए तैयार होते हैं, तो Treg कोशिकाएँ उन्हें ‘चेतावनी’ देती हैं कि “रुको! यह तुम्हारा ही शरीर है, हमला मत करो!” ये कोशिकाएँ सुनिश्चित करती हैं कि इम्यून सिस्टम कभी भी अपने ही अंगों को दुश्मन न माने।

नोबेल क्यों मिला? क्या थी समस्या और क्या ढूंढा समाधान ?

1. समस्या: जब ‘ब्रेक फेल’ हो जाता है

जब किसी व्यक्ति में Treg कोशिकाएँ ठीक से काम नहीं करतीं या उनकी संख्या कम हो जाती है, तो इम्यून सिस्टम का ‘ब्रेक फेल’ हो जाता है। सेना बेलगाम होकर शरीर के ही स्वस्थ अंगों (जैसे जोड़ों की परत, इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाएँ) पर हमला करना शुरू कर देती है।

  • इसका नतीजा: रुमेटीइड अर्थराइटिस (गठिया), मल्टीपल स्क्लेरोसिस, ल्यूपस और टाइप-1 मधुमेह जैसी गंभीर ऑटोइम्यून बीमारियाँ होती हैं।
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2. समाधान: ‘कंट्रोल बटन’ को वापस पाना

नोबेल विजेताओं की खोज ने हमें यह कंट्रोल बटन वापस दे दिया है।

  • वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि Treg कोशिकाओं की संख्या या शक्ति को बढ़ाकर हम इम्यून सिस्टम को शांत कर सकते हैं और ऑटोइम्यून रोगों में हो रहे ‘आत्म-हमले’ को पूरी तरह रोक सकते हैं।
  • यह खोज चिकित्सा विज्ञान में एक क्रांतिकारी कदम है, क्योंकि अब तक इन बीमारियों का इलाज केवल दर्द और सूजन को कम करने तक ही सीमित था, जड़ तक कोई नहीं पहुँच पाया था।

तीन क्षेत्रों में बड़ी क्रांति की उम्मीद, कैंसर उपचार भी संभव

इस खोज का सीधा फायदा केवल ऑटोइम्यून रोगियों को ही नहीं मिलेगा, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम इन क्षेत्रों में भी दिखेंगे:

  1. कैंसर का उपचार: कैंसर के कुछ मामलों में, Treg कोशिकाएँ चालाकी से ट्यूमर के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बना लेती हैं, जिससे शरीर की सेना ट्यूमर को मार नहीं पाती। वैज्ञानिक अब इन कोशिकाओं को अस्थायी रूप से निष्क्रिय करके, शरीर की मुख्य प्रतिरक्षा सेना को कैंसर पर पूरी ताकत से हमला करने का मौका दे सकते हैं।
  2. अंग प्रत्यारोपण (Organ Transplant): जब किसी मरीज़ को नया अंग मिलता है, तो शरीर अक्सर उसे अस्वीकार कर देता है (Rejection)। अब डॉक्टर Treg कोशिकाओं का उपयोग करके शरीर को नए अंग के प्रति ‘दोस्त’ जैसा व्यवहार करने के लिए राजी कर सकते हैं, जिससे अंग अस्वीकृति का खतरा बहुत कम हो जाएगा।
  3. पुरानी लाइलाज बीमारियाँ: इस खोज से पता चलता है कि कई पुरानी लाइलाज बीमारियों का रहस्य हमारे शरीर के अंदर ही छिपा है। विज्ञान अब उन्हें सुलझाने के लिए एक नई दिशा में आगे बढ़ सकेगा।

यह 2025 का चिकित्सा नोबेल पुरस्कार और कैंसर उपचार के भविष्य की नींव है। विजेताओं में शिमोन साकागुची को अक्सर ‘Treg कोशिकाओं के जनक’ (Father of Treg Cells) के रूप में जाना जाता है, क्योंकि उन्होंने ही पहली बार इन नियंत्रक कोशिकाओं की पहचान की थी। वहीं, मैरी ई. ब्रुनको और फ्रेड रामस्डेल ने उस जीन और आणविक मार्ग की पहचान की जिसने इन Treg कोशिकाओं के विकास को नियंत्रित किया, जिससे वैज्ञानिकों को यह पता चला कि इन कोशिकाओं की कमी से ही ऑटोइम्यून रोग कैसे शुरू होते हैं।

इस साल नोबेल के अन्य मजबूत दावेदारों में जीनोम एडिटिंग तकनीक (विशेषकर CRISPR-Cas9) से जुड़े वैज्ञानिक भी थे, जो कि बीमारियों के इलाज के लिए DNA को सटीक रूप से बदलने की क्षमता रखता है। इसके अलावा, माइक्रोबायोम (Microbiome) रिसर्च यानी मानव शरीर में मौजूद अरबों बैक्टीरिया पर हुए गहन शोध को भी संभावित विजेता माना जा रहा था, क्योंकि यह भी प्रतिरक्षा और कई रोगों को नियंत्रित करता है। हालांकि, नोबेल समिति ने अंततः Treg कोशिकाओं की मौलिक और निर्णायक खोज को चुना। इस खोज की महत्ता यह है कि यह सीधे मानव शरीर के भीतर ‘परिधीय प्रतिरक्षा सहिष्णुता’ को स्थापित करती है, जो कि चिकित्सा विज्ञान में एक मूलभूत समझ है और जिसका क्लीनिकल प्रभाव तत्काल दिखाई देता है। यह नोबेल, इम्यूनोथेरेपी के युग को एक नई दिशा देगा।

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