भारत की न्यायपालिका के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब समय ठहर जाता है, और संविधान की मोटी किताबें अचानक धर्म की धूल से ढँक जाती हैं। ऐसा ही एक अविस्मरणीय क्षण सुप्रीम कोर्ट के एक कक्ष में तब आया, जब एक धर्मनिष्ठ वकील ने देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई की ओर जूता फेंकने का प्रयास किया ।
यह कोई साधारण आपराधिक कृत्य नहीं था; यह तो आधुनिक युग का पवित्र ‘चरण स्पर्श’ था, एक ऐसा गतिशील, ऊर्जा से भरपूर आध्यात्मिक प्रयास जिसने सदियों पुरानी परंपरा को एक तात्कालिक, विद्रोही रूप दे दिया। हमें उस महान कर्मवीर का चरण चुंबन करनी चाहिए जिसने वह कर दिखाया जो सदियों से चल रही बहसें और सेमिनार नहीं कर पाए।
क्या CJI गवई पर जूता फेंकना आवश्यक था? बिल्कुल! यह कृत्य उस क्षण अनिवार्य हो गया जब न्यायाधीश महोदय ने धर्मपरायणता की राजनीतिक शक्ति को चुनौती दी। CJI गवई ने एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को अत्यंत तर्कसंगत, किंतु धर्मभीरुओं के लिए असहनीय, सलाह दी थी। उन्होंने कहा था कि यह विशुद्ध रूप से प्रचार-हित याचिका है, इसलिए “Go and ask the deity himself to do something” (जाओ और देवता से खुद कुछ करने के लिए कहो) ।
यह साधारण टिप्पणी नहीं थी, यह धर्म की राजनीति पर सीधे-सीधे संविधान का प्रहार था। CJI का तर्क स्पष्ट था: यदि आप इतने बड़े भक्त हैं, तो प्रार्थना करें, ध्यान करें; अदालतें ईश्वर के चमत्कारों की मध्यस्थता का मंच नहीं हैं। लेकिन धर्म के राजनीतिक ठेकेदारों के लिए यह बड़ी गुस्ताखी थी। इस टिप्पणी ने न्यायालय को धर्म के अनुष्ठानिक और राजनीतिक उपकरण के रूप में प्रयोग करने की कोशिश को सीधे खारिज कर दिया।
और यहीं, अधिवक्ता राकेश किशोर जी ने अपना जूता निकाल कर उस पवित्र ‘अपमान’ का बदला लेने की ठान ली। उनका उद्घोष था: “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे”। यह उद्घोष मात्र एक नारा नहीं था, बल्कि यह उस संपूर्ण वैचारिक लड़ाई का सार था जहाँ ‘अपमान’ की भावना, न्याय, तर्क, और समानता के किसी भी विचार से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। यह प्रमाणित होता है कि धर्म के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता उसकी भावना, उसकी श्रेष्ठता को बनाए रखना है, न कि उसकी सामाजिक या मानवीय जिम्मेदारी को।
एक बात यह है कि CJI बी.आर. गवई अनुसूचित जाति (SC) समुदाय से आते हैं और भारत के पहले बौद्ध मुख्य न्यायाधीश हैं। इस संदर्भ में, ‘सनातन का अपमान’ को सहने से इनकार करना, अप्रत्यक्ष रूप से न्यायिक पदानुक्रम में जातिगत श्रेष्ठता की बहाली की मांग है। यह हमला केवल एक याचिका की खारिज पर नहीं हुआ, बल्कि यह न्यायिक क्षेत्र में संवैधानिक समानता के प्रवेश पर हुआ, जिसका प्रतिनिधित्व CJI गवई कर रहे थे।
जूता फेकू दर्शन : एक सफल दर्शन (राजनीतिक रूप से तो SUPERHIT)
जूता फेंकने वाले ‘धर्मरक्षक’ का दर्शनशास्त्र बहुत सीधा है: सार्वजनिक, सनसनीखेज हिंसा उन सभी लोगों के ध्यान को एक झटके में खींच लेती है जो चुपचाप, संरचनात्मक हिंसा से पीड़ित हैं।
लेकिन इस कृत्य को वैचारिक मजबूती तब मिली जब देश के प्रमुख धर्मगुरुओं ने हिंसा की औपचारिक निंदा करते हुए भी, CJI के बयान को गलत ठहराया। जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने जूता फेंकने की निंदा तो की, लेकिन तुरंत जोड़ा कि “चीफ जस्टिस ने अपनी मर्यादाओं से हटकर ऐसा किया” और “CJI का बयान ज्यादा गलत था” ।
इसने हमें धर्म की राजनीति का सबसे पेचीदा सिद्धांत दिया:
- मर्यादा का सिद्धांत: धर्मगुरुओं ने एक न्यायाधीश के लिए तुरंत ‘मर्यादा’ की लक्ष्मण रेखा खींच दी। मर्यादा, जिसका जाति व्यवस्था के भीतर हमेशा से एक निश्चित अर्थ रहा है , यहाँ न्यायालय के तर्क पर लागू की गई। संदेश स्पष्ट था: आप संविधान के आधार पर तार्किक निर्णय दे सकते हैं, लेकिन जब धर्म की बात आए, तो आपकी तार्किकता की सीमाएं हम तय करेंगे। यदि आप देवता से पूछने की सलाह देते हैं, तो आप अपनी संवैधानिक सीमा नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक मर्यादा तोड़ रहे हैं।
- हिंसा की स्वीकृति: जूता फेंकना गलत बताया गया, लेकिन CJI का बयान ज्यादा गलत बताया गया। यह नैतिक समानता स्थापित करने की कोशिश है, जहाँ एक आपराधिक हिंसा (जूता फेंकना) को एक तार्किक, संवैधानिक टिप्पणी के बराबर खड़ा कर दिया गया। यह एक ऐसी व्यवस्था को वैधता प्रदान करता है जहाँ धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाने वाला तर्क, शारीरिक हिंसा से ज्यादा निंदनीय है।
इस ‘धर्मरक्षक’ ने यह सुनिश्चित किया कि राष्ट्रीय बहस का केंद्र बिंदु एक न्यायाधीश का ‘अपमान’ हो, न कि वह अमानवीय सामाजिक व्यवस्था जिसका निदान बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने किया था। यह दर्शन हमें सिखाता है कि अमूर्त ‘देवता’ की प्रतिष्ठा, जीवित मनुष्यों की पीड़ा से कहीं अधिक कीमती है। धार्मिक हिंसा दरअसल एक प्रदर्शन है जो सामाजिक और आर्थिक शोषण से ध्यान भटकाने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
सनसनीखेज हिंसा बनाम संरचनात्मक हिंसा
जूता फेंकना सनसनीखेज, तात्कालिक हिंसा है। यह त्वरित प्रसिद्धी, तत्काल ध्यान और धार्मिक श्रेष्ठता के प्रदर्शन के लिए किया गया एक ‘Performance’ है ।
इसके विपरीत, वह हिंसा जिसे डॉ. आंबेडकर ने ‘जाति-आधारित संरचनात्मक हिंसा’ कहा था, वह अदृश्य और मूक होती है। यह वह हिंसा है जहाँ दलितों को केवल अपनी मूछें स्टाइल करने या ‘ऊंची जाति’ के पुरुषों से सीधे आँख मिलाने पर हत्या या अत्याचार का सामना करना पड़ता है । यह वह हिंसा है जहाँ जातिगत पूर्वाग्रहों के कारण दलित छात्रों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ता है, जहाँ उनकी आत्म-गरिमा को बुरी तरह कुचला जाता है ।
जूता फेंकने वाले का दर्शनशास्त्र इस संरचनात्मक हिंसा (Structural Violence) को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देता है। वह उस व्यवस्था की बात नहीं करता जहाँ दलितों को ‘मानव से कम’ (less than man) माना जाता है, जहाँ उनके अधिकारों को नकारा जाता है । वह केवल उस धार्मिक अहंकार की रक्षा करने के लिए खड़ा होता है जिसे CJI गवई के तर्क ने क्षण भर के लिए चुनौती दी थी। धार्मिक कट्टरता और जातिगत भेदभाव का यह गहरा रिश्ता है, जो यह सिद्ध करता है कि एक अमूर्त आस्था की रक्षा, सामाजिक समानता की स्थापना से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है ।
‘एपिसटेमिक हिंसा’ का धार्मिक वर्ज़न
यह कृत्य एक तरह की एपिसटेमिक हिंसा (Epistemic Violence) है। यह तब होती है जब किसी व्यक्ति के अस्तित्व या वास्तविकता को नकार कर, उसकी आत्म-गरिमा को कम किया जाता है । CJI Gavai ने जब तर्क का प्रयोग किया, तो उन्होंने धार्मिक प्रभुत्व की उस वास्तविकता को नकारा जो न्यायपालिका पर हावी होना चाहती थी। वकील ने जूता फेंककर, तर्क को खारिज करने और बल द्वारा पदानुक्रम को पुनः स्थापित करने की कोशिश की ।
यह उस विचार की हिंसक अस्वीकृति थी कि एक SC न्यायाधीश कानूनी अधिकार के साथ धार्मिक मामलों को तर्कसंगत तरीके से संबोधित कर सकता है। जूता फेंकना आसान और तात्कालिक प्रसिद्धि देने वाला काम है; जबकि जातिगत संरचनाओं को खत्म करना कठिन, लंबा संघर्ष है। हमारा ‘धर्मयोद्धा’ आसान रास्ता चुनकर, व्यवस्था के ‘असली खलनायकों’ (असमानता के समर्थक) के एजेंडे को ही आगे बढ़ाता है।
आंबेडकर की नज़र में जूता और जाति:
यदि हम इस घटना को डॉ. बी.आर. आंबेडकर के दर्शन की टेढ़ी नज़र से देखें, तो यह जूता फेंकना एक आवश्यक, प्रतीकात्मक सत्य का उद्घाटन बन जाता है। जूता फेंकने वाला व्यक्ति केवल एक अपराधी नहीं है; वह आंबेडकर के निष्कर्षों को सार्वजनिक रूप से सिद्ध करने वाला एक आदर्श ‘शिष्य’ है।
आंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि जाति व्यवस्था की पवित्रता का विचार उनके धर्म से उत्पन्न होता है । उनका सवाल था: “Will you show that courage? You must not only discard the Shastras, you must deny their authority, as did Buddha and Nanak. You must have courage to tell the Hindus that what is wrong with them is their religion—the religion which has produced in them this notion of the sacredness of Caste” (क्या आप वह साहस दिखाएंगे? आपको न केवल शास्त्रों को त्यागना होगा, बल्कि उनके अधिकार को अस्वीकार करना होगा… आपको हिंदुओं को यह बताने का साहस करना होगा कि उनमें जो गलत है, वह उनका धर्म है—वह धर्म जिसने उनमें जाति की पवित्रता की यह धारणा पैदा की है) ।
इस संदर्भ में, वकील ने जूता फेंक कर यह सिद्ध कर दिया कि आंबेडकर का विश्लेषण पूरी तरह सही था। हिंसा और अपमान की यह त्वरित प्रतिक्रिया दिखाती है कि धार्मिक आस्थाएँ तर्कसंगत न्याय से पहले जातिगत श्रेष्ठता के संरक्षण की मांग करती हैं।
परंपरा का आधुनिक अवतार
आंबेडकर ने जाति को “control” (नियंत्रण) का दूसरा नाम बताया । जाति, उनके अनुसार, “puts a limit on enjoyment” (उपभोग पर एक सीमा लगाती है)। यह व्यक्ति को जाति की सीमाओं का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं देती ।
CJI बी.आर. गवई, जो स्वयं एक SC न्यायाधीश हैं, सुप्रीम कोर्ट के सर्वोच्च पद तक पहुँच कर उस “limit on enjoyment” का उल्लंघन कर रहे थे जो पारंपरिक जातिगत व्यवस्था ने उन पर थोपी होगी । इस प्रणाली के लिए, CJI की कुर्सी पर उनका बैठना, उनका तर्कसंगत ढंग से धार्मिक याचिकाओं को खारिज करना, स्वयं में एक ‘अपमान’ है। जूता फेंकना, इसलिए, उस पारंपरिक नियंत्रण (Caste Control) को हिंसक रूप से पुनः स्थापित करने का प्रयास था—एक प्रतीकात्मक घोषणा कि आप संवैधानिक पदों पर तो पहुँच सकते हैं, लेकिन अपनी पारंपरिक सीमा को नहीं भूल सकते।
आंबेडकर ने हिंदू पुरोहित वर्ग की तीखी आलोचना करते हुए उन्हें एक ऐसा ‘कीट’ (pest) बताया था जिसे “divinity seems to have let loose on the masses for their mental and moral degradation” (दिव्यता ने जनसमूह के मानसिक और नैतिक पतन के लिए खुला छोड़ दिया है) । उन्होंने कहा था कि पुरोहिती एकमात्र ऐसा पेशा है जहाँ दक्षता की आवश्यकता नहीं होती, और यह वर्ग “neither to law nor to morality” (न तो कानून और न ही नैतिकता के अधीन है) ।
हमारा महान जूता फेंकने वाला, राकेश किशोर जी, उसी परंपरा का आधुनिक अवतार है। उन्होंने बिना किसी कानूनी या नैतिक संहिता के, स्वयंभू धार्मिक अधिकारी बनकर, एक न्यायाधीश के खिलाफ हिंसा का प्रयास किया। यह कृत्य सिद्ध करता है कि धार्मिक कट्टरता कानून या नैतिकता के अधीन होने से इनकार करती है; यह केवल अधिकार और विशेषाधिकार जानती है ।
न्यायपालिका का ‘विशेष’ कवच’ :
यदि जूता फेंकने वाला वकील केवल एक सनकी व्यक्ति होता, तो हम इस घटना को यहीं समाप्त कर सकते थे। लेकिन यह कृत्य न्यायपालिका के उस गंभीर संस्थागत संकट को रेखांकित करता है जिसे ‘कॉलेजियम प्रणाली’ (Collegium System) की संरचनात्मक अक्षमता द्वारा पोषित किया जाता है। जूता फेंकने वाले ने जिस CJI पर हमला किया, वह सर्वोच्च न्यायालय में व्याप्त जातिगत असंतुलन का एक दुर्लभ अपवाद है।
CJI गवई की ‘विरलता’
कॉलेजियम प्रणाली 1993 में अस्तित्व में आई । तब से लेकर आज तक, सर्वोच्च न्यायालय में केवल तीन अनुसूचित जाति (SC) के न्यायाधीश नियुक्त हुए हैं: जस्टिस के.जी. बालकृष्णन (2000), जस्टिस बी.आर. गवई (2019), और जस्टिस सी.टी. रविकुमार (2021) ।
यह आँकड़ा स्तब्ध कर देने वाला है। CJI गवई उस विशाल हिंदू सामाजिक ढांचे में से न्यायिक सर्वोच्चता तक पहुँचने वाले केवल तीसरे एससी न्यायाधीश हैं। उनकी उपस्थिति स्वयं में उस पारंपरिक जाति-नियंत्रण का उल्लंघन है जिसके खिलाफ जूता फेंका गया। इस घटना का विश्लेषण करने वाले विद्वानों को यह समझना चाहिए कि हमलावर की हिंसक प्रतिक्रिया इस बात का सार्वजनिक प्रमाण है कि वह न्यायिक संरचना में अपने विशेषाधिकारों के ‘दर्पण प्रतिबिंब’ को देखना चाहता है ।
भारत के मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने 2023 में ठीक ही कहा था कि “people will start trusting the judiciary only when they see a reflection of themselves in the people who dispense justice” (लोगों को न्यायपालिका पर तभी भरोसा होना शुरू होगा जब वे न्याय देने वाले लोगों में खुद का प्रतिबिंब देखेंगे) । लेकिन जूता फेंकने वाले के कृत्य ने यह साबित कर दिया कि सत्ता के पारंपरिक केंद्र इस “प्रतिबिंब” को देखना ही नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि न्यायपालिका केवल उनके अपने वर्ग की सामाजिक और धार्मिक श्रेष्ठता को प्रतिबिंबित करे।
कॉलेजियम: संरचनात्मक हिंसा का एक कवच
कॉलेजियम प्रणाली, जो नियुक्तियों में पारदर्शिता की कमी के कारण आलोचना का शिकार रही है, प्रभावी रूप से एक ‘जाति-कवच’ (Caste-Kavach) के रूप में कार्य करती है। वर्ष 2023 में भी, जब सर्वोच्च न्यायालय अपनी पूरी क्षमता पर था, तब भी धार्मिक अल्पसंख्यकों, महिलाओं और हाशिए के समुदायों का प्रतिनिधित्व चौंकाने वाली हद तक कम था ।
न्यायिक संरचना में प्रतिनिधित्व की यह कमी एक प्रकार की संरचनात्मक हिंसा है। संरचनात्मक हिंसा तब होती है जब कोई प्रणाली जानबूझकर लोगों को उनके अधिकारों और अवसरों से वंचित करती है । यह हिंसा, जूता फेंकने की तात्कालिक, सनसनीखेज हिंसा से कहीं अधिक गहरी और विनाशकारी है। कॉलेजियम द्वारा दशकों तक अनुसूचित जाति के योग्य व्यक्तियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व से वंचित रखना, नियंत्रण स्थापित करने का एक शांत तरीका है ।
यदि CJI गवई का पदस्थापन न्यायिक प्रक्रिया में देर से होता, तो हो सकता था कि उन्हें CJI बनने या कॉलेजियम का सदस्य बनने का मौका ही न मिलता । यह देरी भी एक प्रकार की सूक्ष्म, संस्थागत बाधा है जिसका सामना हाशिए पर पड़े न्यायाधीशों को करना पड़ता है।
जूता फेंकने वाले का कृत्य अप्रत्यक्ष रूप से इस प्रणाली की रक्षा कर रहा था। वह यह सुनिश्चित करना चाहता था कि यदि कोई ‘अवांछित’ व्यक्ति गलती से शीर्ष तक पहुँच भी जाए, तो उसे भय और हिंसा के माध्यम से चुप करा दिया जाए। जूता फेंकना, इसलिए, उस सदियों पुरानी अवमानना को व्यक्त करने का सबसे नया और गतिशील तरीका था जिसे आंबेडकर ने एक न्यायपूर्ण समाज का शत्रु माना था ।
सैल्यूट टू द ‘जूता मैन’
जूता फेंकने वाले ‘धर्मयोद्धा’ को सल्यूट करने का मतलब यह है कि हम उस कुरूप सच्चाई को स्वीकार करें जो उसने उजागर की है। उसने हमें दिखाया कि न्यायिक सर्वोच्चता पर बैठा एक तर्कसंगत न्यायाधीश, पारंपरिक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लिए कितना असहनीय है।
इस घटना का वास्तविक निष्कर्ष व्यक्ति की निंदा करने में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को समझने में निहित है जिसकी नींव ही असमानता पर टिकी है। आंबेडकर का स्पष्ट आह्वान आज भी गूंजता है। हमें उन स्मृतियों और शास्त्रों के अधिकार को खारिज करना होगा जो इस जातिगत संरचना को पवित्रता प्रदान करते हैं । जब तक धर्म जाति की पवित्रता को बल देता रहेगा, तब तक हर संवैधानिक तर्क के जवाब में जूता फेंका जाता रहेगा। यह जूता हमें बताता है कि संविधान की रक्षा करने का अर्थ है—धर्म के नाम पर होने वाले नियंत्रण और हिंसा की बुनियाद को हिला देना।
