एक 2 घंटे की फ़िल्म आपको किस कदर तक 3 साल पहले के उस समय में लिए जाती है, जिसे शायद हम सब लगभग भूल चुके हैं? एक महामारी जिसने सबको आहत किया, पर समय के साथ हम उन सब चीज़ों के परे उठ कर, सब भूल कर, एक नई शुरुआत में लग चुके हैं और अचानक से ऐसी कोई मूवी बनती है जो हमे उस समय मे ले जाती है जिसे हम याद करने से ज्यादा भूलना चाहते है , चार रिव्यू पढ़ कर हफ़्ते में जिस दिन सबसे सस्ती टिकट मिल जाए, अपने अंदर के बचे हुए उस थोड़े से फ़िल्मी Enthusiastic फ़ील को जगाए रखने के लिए चले जाते हैं। पर सवाल ये है कि ये ‘Dopamine वाली क्रांति’ कब तक आपको झकझोर सकती है?
इस फ़िल्म में दिखाई गई कहानी एक सच्ची घटना से प्रेरित है, जिसे जर्नलिस्ट बशारत पीर के 2020 के निबंध “Taking Amrit Home” (जिसका अब नाम बदल कर “A Friendship, a Pandemic and a Death Beside the Highway” कर दिया गया है) से लिया गया है। फ़िल्म के पहले हाफ़ में कैरेक्टर को डेवलप किया गया है, जिसमें कहानी को धीरे-धीरे किरदारों के ज़रिए बढ़ाया गया है और कहानी के मूल रूप को प्रारूप दिया गया है।

TAKING AMRIT HOME
फ़िल्म के शुरुआत से ही किरदारों द्वारा बख़ूबी कैरेक्टराइज़ेशन का प्रमाण पत्र सभी दर्शकों को दिया गया, कि इस OTT वाली दुनिया में, जहाँ कंटेंट की भरमार है, हर दूसरे दिन 4 नई फ़िल्में और वेब सीरीज़ किसी नए OTT चैनल पर आ जाती हैं।
उस समय में, जहाँ मेनस्ट्रीम बॉलीवुड में हर दिन प्यार की नई परिभाषा और हेवी बजट की स्टारकास्ट से लबरेज़ कोई बड़ी सेट वाली मूवी जो आपको आपके रियलिटी से एकदम दूर यूटोपिया वाली दुनिया की लव स्टोरी और एक्शन थ्रिलर दिखा रही है, वहाँ एक ऐसी फ़िल्म आयी है, जो आपको आपके अगल-बगल के सच को उस हद तक दिखाने का प्रयास कर रही है ,जहां सच ‘भोगे हुए यथार्थ ‘जैसा लगने लगता है और पर्दे पर समाज को देखने का सिनेमाई लेंस हट जाता है , और घर से जाकर आप परदे पर घर को देखने लगते है ।
ये समाज के उस पहलू को दिखाती है जो बिल्कुल ‘Unsophisticated yet Real’ है। दो दोस्तों की ऐसी संघर्ष और यातना भरी यात्रा और उनके हार जाने की कहानी कि कैसे इस समाज की व्यवस्था में फँस के मजबूरन न चाहते हुए भी वो सब करना और सहना पड़ता है, जिसे वो शुरू से ही बदलना चाहते थे पर बदल न पाए। यहाँ से लेकर ये कहानी समेटती है उन सब माँ के जज़्बातों को, जिनकी फटी हुई एड़ियाँ उनकी मजबूरियों और ज़मीनी हकीकत से मिला के चलने की वजह से छुप जाती हैं, जिन्हें अक्सर वो खुद जान-बूझकर याद नहीं करतीं। इसके साथ ही ये कहानी बटोरती है वो सारे जवाब जो आज तक बापों ने अपने बेटों से चाहकर भी न कहे हैं, और साथ में ये कुरेदती है वो सारे सवाल जिन्हें बार-बार इस सभ्य समाज के लोगों को याद दिलानी पड़ती है।
ये फ़िल्म सिर्फ़ जातिवाद (Casteism) का ही नहीं, बल्कि पितृसत्ता (Patriarchy) के भी सवाल पूछती है उन सब से, चाहे वो किसी भी वर्ग के हों, जिन्हें इस सभ्य समाज ने तोहफ़े में दिया है। ये सवाल उठाती है उन सब के सपनों पर, जिन्हें जाने-अनजाने में इस समाज ने उन पर थोपा है। ये पूछती है इंसानियत की परिभाषा उन सब साहूकारों से, जिन्होंने इसका ठेका ले रखा है, और साथ में परिभाषित करती है प्रेम के जज़्बात को जो कि इस अमानवीय दुनिया में गिद्धों से भी तेज गति से विलुप्त हो रही है।
ये सवाल पूछती है उस व्यवस्था से, जिसे सुचारु रूप से कार्यों को करने का काम दिया जाता है। ये उन सब डरे हुए लोगों के सवाल हैं, जो इस मूवी के कैरेक्टर चंदन के नाम से जुड़ने वाली जाति से ताल्लुक़ रखते हैं। और आखिर के 20 मिनटों में ये फ़िल्म समेटती है भावुकता का वो भाव जो दर्शकों में काफ़ी समय के लिए घर कर जाती है और लास्ट में परसाई जी की दो लाइन जिससे इस पूरे कहानी का सार निकाला जाए तो:
“एक जीवित रहने का संघर्ष है और एक सम्पन्नता का संघर्ष है।
एक न्यूनतम जीवन-स्तर न कर पाने का दुख है…”
