ज़रा साठ के दशक के भारत की कल्पना कीजिए। देश पर कांग्रेस का ऐसा ‘अखंड राज’ था कि विपक्षी पार्टियाँ ऐसे लगती थीं, मानो किसी शाही बारात में बिना बुलाए मेहमान हों। पंडित नेहरू के जाने के बाद भी, कांग्रेस की ‘पकड़’ ढीली नहीं पड़ी थी। वह ऐसे शासन कर रही थी, जैसे यह देश उसे ‘दान’ में मिला हो। जनता के पास विकल्प के नाम पर बस कांग्रेस का ‘पुरातन’ मॉडल था, और विरोधी खेमे इतने बंटे थे कि अपनी ‘किस्मत’ पर रोने के सिवा कुछ कर नहीं पाते थे। संसद में विपक्ष की आवाज़ उतनी ही सुनाई देती थी, जितनी किसी खाली हॉल में गूँजती अकेली ताली की। इस ‘लोकतंत्र के ढकोसले’ पर लोहिया जी की ‘भृकुटि’ हमेशा तनी रहती थी।

ठीक इसी समय, राजनीति के सबसे ‘बेचैन’, ‘अल्हड़’ और ‘साहसी’ सर्जन, डॉ. राममनोहर लोहिया, ने देश के ‘सियासी शरीर’ की नब्ज़ पकड़ी। उन्हें बीमारी साफ दिखी: कांग्रेस का सत्ता-मद और विपक्ष की वैचारिक नपुंसकता। इस बीमारी का उन्होंने एक ही ‘इलाज’ सुझाया – ‘गैर-कांग्रेसवाद’। लोहिया जी का तर्क बड़ा ‘वैज्ञानिक’ था: “जब एक ही दुश्मन है, तो सारे दुश्मनों को एक हो जाना चाहिए।” यानी, वैचारिक शुद्धता का हवन थोड़ी देर के लिए स्थगित किया जाए और पहले उस ‘महा-असुर’ (कांग्रेस) को सत्ता से बेदखल किया जाए। यह कुछ ऐसा था, जैसे किसी बीमार को बचाने के लिए, डॉक्टर और तांत्रिक, दोनों को एक साथ ऑपरेशन थिएटर में घुसा दिया गया हो। लक्ष्य एक था: ‘मरीज को बचाना’, भले ही तरीका कितना भी ‘अवैज्ञानिक’ क्यों न हो। अगर उस वक्त परसाई जी होते, तो शायद कहते: “यह देश भी अजब है। जब तक सत्ता हाथ में नहीं आती, तब तक ‘विचारों की पवित्रता’ की बातें होती हैं। ज्यों ही सत्ता की चाबी दिखती है, ‘पवित्रता’ को अलमारी में बंद करके, ‘उपयोगिता’ का चोला पहन लिया जाता है।”
और इस ‘गैर-कांग्रेसवाद’ के सिद्धांत का सबसे बड़ा ‘प्रयोगशाला’ बना उत्तर प्रदेश, सन् 1967 के विधानसभा चुनावों में। लोहिया ने इस बड़े राज्य में कांग्रेस को हराने का ‘पहाड़ तोड़ने’ जैसा लक्ष्य रखा। इस ‘महा-मिशन’ को पूरा करने के लिए, कई पार्टियों ने मिलकर ‘संयुक्त विधायक दल’ (Samyukta Vidhayak Dal – SVD) का गठन किया। इस ‘दल’ में कौन-कौन शामिल हुआ? एक तरफ डॉ. लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी थी, जो ‘जाति तोड़ो’, ‘अंग्रेजी हटाओ’ और ‘असमानता मिटाओ’ जैसे ‘क्रांतिकारी’ और ‘प्रगतिशील’ नारों के साथ देश में एक नए ‘समाजवाद’ की स्थापना का सपना देखती थी। इनके लिए ‘सामाजिक न्याय’ सर्वोपरि था, और ‘गरीब-गुरबा’ ही भगवान। इनके कार्यकर्ता ‘बराबरी’ और ‘नया समाज’ बनाने का दम भरते थे।
और दूसरी तरफ? दूसरी तरफ थी भारतीय जनसंघ, जिसके नेतृत्व में श्री दीनदयाल उपाध्याय और युवा अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता थे। इनके लिए ‘भारतीय संस्कृति’, ‘हिंदुत्व’, ‘राष्ट्रवाद’ और ‘एकात्म मानववाद’ ही अंतिम सत्य था। इनके स्वयंसेवक ‘शाखा’ में ‘संस्कार’ और ‘देश प्रेम’ का पाठ पढ़ते थे। जहाँ समाजवादी ‘मंदिर-मस्जिद तोड़ो’ की बात नहीं करते थे (क्योंकि उनके लिए ‘गरीबी’ ही असली मुद्दा था), वहीं जनसंघ ‘राम मंदिर’ के निर्माण का स्वप्न देखता था। यह मेल ऐसा था, जैसे किसी ने ‘गरमा-गरम दाल’ में ‘मीठी खीर’ मिलाकर ‘बढ़िया भोजन’ परोस दिया हो! स्वाद कुछ तो नया और ‘अजीब’ निकलना ही था, जो कई लोगों के गले से आसानी से उतरने वाला नहीं था।
डॉ. लोहिया, एक बड़े विचारक तो थे, लेकिन उनकी समाजवादी पार्टी के पास ‘वोटरों को बूथ तक लाने’ वाली ‘पैदल सेना’ यानी ‘कैडर’ की भारी कमी थी। समाजवादी विचार, बौद्धिक बहसों और छात्रों के बीच तो लोकप्रिय थे, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के हर कोने तक पहुँचने वाली ‘संगठनात्मक शक्ति’ उनके पास नहीं थी। दूसरी ओर, जनसंघ और उसके पीछे की ‘अदृश्य’ शक्ति RSS की बात करें तो उनके पास ‘अडिग अनुशासन’, ‘अथक समर्पण’ और एक ऐसा ‘शाखा-तंत्र’ था जो देश के कोने-कोने में फैला हुआ था। ये कार्यकर्ता बिना किसी ‘विशेष लाभ’ की अपेक्षा के, सुबह-शाम ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाते हुए ‘घर-घर संपर्क’ करने की कला में माहिर थे। उनकी यह ‘मशीनरी’ चुनावों में गेम चेंजर साबित हो सकती थी।
तो ‘समझौता’ कुछ इस तरह हुआ:
- जनसंघ ने दिया: अपनी ‘सुनिश्चित संगठनात्मक मशीनरी’, जो वोटरों को बूथ तक ला सकती थी। उनके स्वयंसेवक, जो ‘समाजवादी’ प्रत्याशियों के लिए भी ‘गली-गली’ घूमकर प्रचार करने को तैयार थे, बशर्ते कांग्रेस हारे। उनके लिए ‘कांग्रेस हटाओ’ ही मुख्य धर्म बन गया था, भले ही उसके लिए ‘अधर्मी’ से भी हाथ मिलाना पड़े।
- लोहिया ने लिया: जनसंघ की ‘मैन-पावर’ का इस्तेमाल, अपने ‘गैर-कांग्रेसवाद’ के नारे को उत्तर प्रदेश के हर दरवाज़े तक पहुँचाने के लिए। यह एक ऐसी ‘डील’ थी, जिसमें ‘विचार’ को कुछ देर के लिए ‘हथियार’ बना लिया गया था। ‘राजनीति में सब जायज़ है’ के सिद्धांत का यह एक उत्कृष्ट उदाहरण था।
यह राजनीति का वह ‘आश्चर्यजनक दृश्य’ था, जिसे देखकर ‘वैचारिक शुद्धता’ के ‘पंडितों’ की आँखें फटी की फटी रह गई होंगी। जनसंघ के कार्यकर्ता ‘समाजवादी’ प्रत्याशियों के लिए ‘कमल’ के साथ-साथ ‘साइकिल’ (सोशलिस्ट पार्टी का चुनाव चिन्ह) का बटन दबाने की अपील करते पाए गए, और समाजवादी नेता ‘हिन्दुत्ववादी’ नारों के मंच साझा करते दिखे। यह ऐसा था, जैसे किसी ‘बिल्ली’ और ‘शेर’ ने ‘चूहों’ के खिलाफ गठबंधन कर लिया हो – दुश्मनी कुछ देर के लिए ‘स्थगित’ हो गई थी, और मकसद एक ही था: ‘सत्ता की मलाई’ चखना।
चुनावी नतीजे आए और पूरा देश ‘हैरान’ रह गया! कांग्रेस को इतिहास का सबसे बड़ा झटका लगा। उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में SVD की सरकार बनी, और जनसंघ को उसमें महत्वपूर्ण स्थान मिला। जिन जनसंघी नेताओं को पहले ‘राजनीतिक अछूत’ माना जाता था, वे अब मंत्रालय की कुर्सियों पर विराजमान थे, और ‘प्रशासन’ का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए। यह एक ऐसा ‘सियासी रूपांतरण’ था, जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी।
लोहिया जी ने इस ‘अस्थायी विवाह’ को ‘सही’ ठहराते हुए कहा था कि यह ‘विषपान’ है, जो ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के लिए आवश्यक है। उन्होंने ‘जहर’ पीकर ‘अमृत’ निकालने की बात की थी। लेकिन इतिहास की ‘टेढ़ी नज़र’ पूछती है: क्या यह ‘विषपान’ भविष्य के लिए किसी और बड़े ‘विषाक्त’ वृक्ष का बीज नहीं बो गया?
- तत्काल प्रभाव: कांग्रेस की ‘सत्ता की मस्ती’ पर अंकुश लगा। विपक्ष को यह समझ आया कि वे भी ‘सरकार’ बना सकते हैं। यह लोकतंत्र के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत थी, जहाँ गठबंधन की राजनीति की नींव पड़ रही थी।
- दीर्घकालिक परिणाम: इस गठबंधन ने जनसंघ और RSS को देश की मुख्यधारा की राजनीति में ‘स्वीकार्य’ होने का एक बड़ा मौका दिया। जिस ‘संगठनात्मक शक्ति’ को लोहिया ने केवल कांग्रेस को हटाने के लिए ‘उपयोग’ किया, उसी शक्ति ने दशकों बाद खुद को एक ‘अजेय राजनीतिक शक्ति’ के रूप में स्थापित कर लिया। यह उस ‘जहर’ का ‘साइड इफेक्ट’ था, जिसका अंदाज़ा शायद लोहिया को भी नहीं था। यह घटना भारतीय राजनीति में गठबंधन के प्रयोगों की शुरुआत थी, जिसके दूरगामी परिणाम हुए।

इसे ही शायद राजनीति का ‘कड़वा सत्य’ कहते हैं। आप भले ही ‘सत्ता’ के लिए किसी से ‘हाथ’ मिला लें, लेकिन इतिहास हमेशा उस ‘हाथ’ के भविष्य को भी अपनी ‘टेढ़ी नज़र’ से देखता है। लोहिया जी ने भले ही कांग्रेस को कमजोर किया, लेकिन उन्होंने अनजाने में ही उस वैचारिक प्रतिद्वंद्वी को मंच और ताकत दे दी, जो उनके अपने समाजवादी विचारों को ही भविष्य में सबसे बड़ी चुनौती देने वाला था। यह एक ऐसा ‘इतिहास का ट्विस्ट’ है, जो आपको ‘सोचने’ पर मजबूर कर देता है, और हमारी ‘टेढ़ी नज़र’ इस पर बार-बार पड़ती है!
