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जब ‘वैचारिक अस्पृश्यता’ ने ‘सत्ता’ के सामने घुटने टेके: लोहिया की ‘समाजवादी गंगा’ और जनसंघ का ‘सांस्कृतिक सागर’ एक ही ‘नाव’ पर!

ज़रा साठ के दशक के भारत की कल्पना कीजिए। देश पर कांग्रेस का ऐसा ‘अखंड राज’ था कि विपक्षी पार्टियाँ ऐसे लगती थीं, मानो किसी शाही बारात में बिना बुलाए मेहमान हों। पंडित नेहरू के जाने के बाद भी, कांग्रेस की ‘पकड़’ ढीली नहीं पड़ी थी। वह ऐसे शासन कर रही थी, जैसे यह देश…

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